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इस्लाम ने पुरुष के लिए महिला को मारने की अनुमति क्यों दी?

Family and women
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मुहम्मद -शांति और आशीर्वाद उनपर हो- ने अपने जीवन में कभी किसी महिला को नहीं मारा। जहाँ तक क़ुरआन की उस आयत का संबंध है, जिसमें मारने के बारे में बताया गया है, तो इसका अर्थ अवज्ञा के मामले में हल्की मार है। किसी समय संयुक्त राज्य अमेरिका के मानव निर्मित क़ानून में इस प्रकार की मार की विशेषता बयान की गई है कि ऐसी मार हो जो शरीर पर कोई प्रभाव न छोड़े। दरइसल सका सहारा उससे बड़े खतरे को रोकने के लिए लिया जाता है। जैसे कि कोई अपने बेटे को गहरी नींद से जगाने पर उसके कंधे को हिलाता है, ताकि उससे परीक्षा का समय न छूट जाए।

आइए एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें, जो अपनी बेटी को खिड़की के सिरे पर खड़ा पाता है, ताकि वह स्वयं को गिरा ले। ऐसे में उसके हाथ अनैच्छिक रूप से उसकी ओर बढ़ेंगे और वह उसे पकड़ कर पीछे धकेल देगा, ताकि वह खुद को नुक़सान न पहुँचाए। यहाँ औरत को मारना उद्देश्य नहीं होता, बल्कि पति की कोशिश उसके घर और उसकी औलाद के भविष्य को बर्बाद करने से पत्नी को रोकने की होती है।

वह भी, यह मर्हला कई चरणों के बाद आता है, जैसा कि आयत में बताया गया है :

''फिर तुम्हें जिन औरतों की अवज्ञा का डर हो, उन्हें समझाओ और सोने के स्थानों में उनसे अलग रहो तथा उन्हें मारो। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानें, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूँढो। निःसंदेह अल्लाह सर्वोच्च, सबसे बड़ा है।'' [211] [सूरा अल-निसा : 34]

सामान्य तौर पर महिलाओं की कमजोरी को देखते हुए इस्लाम ने उन्हें अधिकार दिया है कि अगर पति उनके साथ दुर्व्यवहार करता है, तो वह न्यायपालिका का सहारा ले सकती हैं।

इस्लाम में वैवाहिक संबंधों का मूल सिद्धांत यह है कि यह स्नेह, शांति और दया पर आधारित हो।

''ततथा उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्ही में से जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उनके पास शांति प्राप्त करो। तथा उसने तुम्हारे बीच प्रेम और दया रख दी। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशाननियाँ हैं, जो सोच-विचार करते हैं।'' [212] [सूरा अल-रूम : 21]

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