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පරිණාමවාදය සම්බන්ධයෙන් ඉස්ලාමයේ ස්ථාවරය කුමක්ද?

Faith and belief
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विज्ञान एक सामान्य वंश से विकास की अवधारणा पर ठोस सबूत प्रदान करता है, जिसका जिक्र पवित्र क़ुरआन ने किया है।

''और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई है। क्या वे ईमान नहीं लाते?'' [111] अल्लाह तआला फ़रमाता है :

[सूरा अल-अंबिया : 30] सर्वशक्तिमान ईश्वर ने जीवित प्राणियों को बुद्धिमान और फितरी तौर पर ऐसा बनाया है कि वे अपने आसपास के वातावरण के अनुकूल हों। वे आकार, शक्ल या लंबाई में विकसित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अन्य देशों के विपरीत ठंडे देशों में भेड़ों का एक विशिष्ट आकार और खाल होती है, जो उन्हें ठंड से बचाती है। हवा के तापमान के अनुसार ऊन बढ़ता या घटता है। पर्यावरण के अनुसार आकार और प्रकार भिन्न होते हैं। यहाँ तक कि मनुष्य भी अपने रंग, गुण, भाषा और आकार में भिन्न होते हैं कि कोई भी मनुष्य दूसरे जैसा नहीं है। परन्तु, वे मनुष्य ही रहते हैं, दूसरे प्रकार के पशु में परिवर्तित नहीं होते हैं।

''और उसकी निशानियों में से आसमानों और ज़मीन को पैदा करना और तुम्हारी भाषाओं और रंगों का अलग-अलग होना भी है। नि:संदेह इसमें जानने वालों के लिए निशानियाँ मौजूद हैं।'' [112] ''अल्लाह ही ने प्रत्येक जीवधारी को पानी से पैदा किया है। तो उनमें से कुछ अपने पेट के बल चलते हैं, और कुछ दो पैर पर तथा कुछ चार पैर पर चलते हैं। अल्लाह जो चाहे, पैदा करता है। वास्तव में, अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।'' [113]

[सूरा अल-रूम : 22] [सूरा अल-नूर : 45]

विकासवाद का सिद्धांत, जिसका उद्देश्य एक निर्माता के अस्तित्व को नकारना है, यह सभी जीवित चीजों, जानवरों और पौधों की उत्पत्ति के सामान्य स्रोत के बारे में बताता है। यह बताता है कि वे एक ही पूर्वज यानी एकल-कोशिका वाले जीव से विकसित हुए हैं। उसके अनुसार पहली कोशिका का निर्माण पानी में अमीनो एसिड के संयोजन का परिणाम था, जिसने बदले में डीएनए की पहली संरचना बनाई, जो एक जीव के आनुवंशिक लक्षणों को वहन करता है। इन अमीनो एसिड के संयोजन से, जीवित कोशिका का पहला ढांचा बनाया गया था। विभिन्न पर्यावरणीय और बाहरी कारकों के परिणामस्वरूप इन कोशिकाओं का प्रसार हुआ, जिसने पहले शुक्राणु का निर्माण किया, फिर जोंक में विकसित हुआ और फिर भ्रूण में विकसित हुआ।

जैसा कि हम यहां देख रहे हैं, ये चरण मां के गर्भ में मानव निर्माण के चरणों से बहुत मिलते हैं। हालाँकि, जीवित जीव इस बिंदु पर बढ़ना बंद कर देते हैं। डीएनए में रखी गई आनुवंशिक विशेषताओं के अनुसार एक जीव का निर्माण होता है। उदाहरण के तौर पर मेंढक अपना विकास पूरा करते हैं, पर वे मेंढक ही रहते हैं। इसी तरह, प्रत्येक जीवित जीव अपनी आनुवंशिक विशेषताओं के अनुसार विकसित होता है।

भले ही हम नए जीवों के उद्भव में आनुवंशिक उत्परिवर्तन और आनुवंशिक लक्षणों पर उनके प्रभाव के विषय को स्वीकार करें, यह सृष्टिकर्ता की क्षमता और इच्छा का खंडन नहीं करता है। परन्तु, नास्तिक लोग कहते हैं कि यह बिना किसी इरादे के ही अंजाम पा जाता है। जबकि हम देखते हैं कि सिद्धांत इस बात की पुष्टि करता है कि विकास के ये चरण केवल एक जानकार विशेषज्ञ के इरादे और माप के साथ ही हो सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं। इस प्रकार, निर्देशित विकास, या ईश्वरीय विकास की अवधारणा को अपनाना संभव है, जो जैविक विकास की बात करता है और यादृच्छिकता को अस्वीकार करता है। और विकास के पीछे एक बुद्धिमान, सक्षम और वैज्ञानिक का होना ज़रूरी है, जिसका अर्थ है कि हम विकास को स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन डार्विनवाद को पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं। महान जीवाश्म विज्ञानी और जीवविज्ञानी स्टीफन जोल कहते हैं : "या तो मेरे आधे साथी बहुत मूर्ख हैं या डार्विनवाद धर्म के साथ चलने वाली धारणाओं से भरा है।"

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