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بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلذَّٰرِيَٰتِ ذَرْوًۭا ﴿1﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

गवाह है (हवाएँ) जो गर्द-ग़ुबार उड़ाती फिरती है;

فَٱلْحَٰمِلَٰتِ وِقْرًۭا ﴿2﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर बोझ उठाती है;

فَٱلْجَٰرِيَٰتِ يُسْرًۭا ﴿3﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर नरमी से चलती है;

فَٱلْمُقَسِّمَٰتِ أَمْرًا ﴿4﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर मामले को अलग-अलग करती है;

إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌۭ ﴿5﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

निश्चय ही तुमसे जिस चीज़ का वादा किया जाता है, वह सत्य है;

وَإِنَّ ٱلدِّينَ لَوَٰقِعٌۭ ﴿6﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और (कर्मों का) बदला अवश्य सामने आकर रहेगा

وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْحُبُكِ ﴿7﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

गवाह है धारियोंवाला आकाश।

إِنَّكُمْ لَفِى قَوْلٍۢ مُّخْتَلِفٍۢ ﴿8﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

निश्चय ही तुम उस बात में पड़े हुए हो जिनमें कथन भिन्न-भिन्न है

يُؤْفَكُ عَنْهُ مَنْ أُفِكَ ﴿9﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

इसमें कोई सरफिरा ही विमुख होता है

قُتِلَ ٱلْخَرَّٰصُونَ ﴿10﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

मारे जाएँ अटकल दौड़ानेवाले;

ٱلَّذِينَ هُمْ فِى غَمْرَةٍۢ سَاهُونَ ﴿11﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

जो ग़फ़लत में पड़े हुए हैं भूले हुए

يَسْـَٔلُونَ أَيَّانَ يَوْمُ ٱلدِّينِ ﴿12﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

पूछते है, "बदले का दिन कब आएगा?"

يَوْمَ هُمْ عَلَى ٱلنَّارِ يُفْتَنُونَ ﴿13﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

जिस दिन वे आग पर तपाए जाएँगे,

ذُوقُوا۟ فِتْنَتَكُمْ هَٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تَسْتَعْجِلُونَ ﴿14﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

"चखों मज़ा. अपने फ़ितने (उपद्रव) का! यहीं है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।"

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍ ﴿15﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

निश्चय ही डर रखनेवाले बाग़ों और स्रोतों में होंगे

ءَاخِذِينَ مَآ ءَاتَىٰهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ ﴿16﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

जो कुछ उनके रब ने उन्हें दिया, वे उसे ले रहे होंगे। निस्संदेह वे इससे पहले उत्तमकारों में से थे

كَانُوا۟ قَلِيلًۭا مِّنَ ٱلَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ ﴿17﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

रातों को थोड़ा ही सोते थे,

وَبِٱلْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ ﴿18﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और वही प्रातः की घड़ियों में क्षमा की प्रार्थना करते थे

وَفِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّۭ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ ﴿19﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और उनके मालों में माँगनेवाले और धनहीन का हक़ था

وَفِى ٱلْأَرْضِ ءَايَٰتٌۭ لِّلْمُوقِنِينَ ﴿20﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और धरती में विश्वास करनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है,

وَفِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ أَفَلَا تُبْصِرُونَ ﴿21﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और ,स्वयं तुम्हारे अपने आप में भी। तो क्या तुम देखते नहीं?

وَفِى ٱلسَّمَآءِ رِزْقُكُمْ وَمَا تُوعَدُونَ ﴿22﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और आकाश मे ही तुम्हारी रोज़ी है और वह चीज़ भी जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है

فَوَرَبِّ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ إِنَّهُۥ لَحَقٌّۭ مِّثْلَ مَآ أَنَّكُمْ تَنطِقُونَ ﴿23﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अतः सौगन्ध है आकाश और धरती के रब की। निश्चय ही वह सत्य बात है ऐसे ही जैसे तुम बोलते हो

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَٰهِيمَ ٱلْمُكْرَمِينَ ﴿24﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

क्या इबराईम के प्रतिष्ठित अतिथियों का वृतान्त तुम तक पहँचा?

إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَقَالُوا۟ سَلَٰمًۭا ۖ قَالَ سَلَٰمٌۭ قَوْمٌۭ مُّنكَرُونَ ﴿25﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

जब वे उसके पास आए तो कहा, "सलाम है तुमपर!" उसने भी कहा, "सलाम है आप लोगों पर भी!" (और जी में कहा) "ये तो अपरिचित लोग हैं।"

فَرَاغَ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ فَجَآءَ بِعِجْلٍۢ سَمِينٍۢ ﴿26﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर वह चुपके से अपने घरवालों के पास गया और एक मोटा-ताज़ा बछड़ा (का भूना हुआ मांस) ले आया

فَقَرَّبَهُۥٓ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ ﴿27﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और उसे उनके सामने पेश किया। कहा, "क्या आप खाते नहीं?"

فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةًۭ ۖ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَٰمٍ عَلِيمٍۢ ﴿28﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर उसने दिल में उनसे डर महसूस किया। उन्होंने कहा, "डरिए नहीं।" और उन्होंने उसे एक ज्ञानवान लड़के की मंगल-सूचना दी

فَأَقْبَلَتِ ٱمْرَأَتُهُۥ فِى صَرَّةٍۢ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌۭ ﴿29﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

इसपर उसकी स्त्री (चकित होकर) आगे बढ़ी और उसने अपना मुँह पीट लिया और कहने लगी, "एक बूढ़ी बाँझ (के यहाँ बच्चा पैदा होगा)!"

قَالُوا۟ كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْعَلِيمُ ﴿30﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

उन्होंने कहा, "ऐसी ही तेरे रब ने कहा है। निश्चय ही वह बड़ा तत्वदर्शी, ज्ञानवान है।"

۞ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا ٱلْمُرْسَلُونَ ﴿31﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

उसने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) दूतों, तुम्हारे सामने क्या मुहिम है?"

قَالُوٓا۟ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمٍۢ مُّجْرِمِينَ ﴿32﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

उन्होंने कहा, "हम एक अपराधी क़ौम की ओर भेजे गए है;

لِنُرْسِلَ عَلَيْهِمْ حِجَارَةًۭ مِّن طِينٍۢ ﴿33﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

"ताकि उनके ऊपर मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ,

مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلْمُسْرِفِينَ ﴿34﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

जो आपके रब के यहाँ सीमा का अतिक्रमण करनेवालों के लिए चिन्हित है।"

فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿35﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर वहाँ जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने निकाल लिया;

فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍۢ مِّنَ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿36﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

किन्तु हमने वहाँ एक घर के अतिरिक्त मुसलमानों (आज्ञाकारियों) का और कोई घर न पाया

وَتَرَكْنَا فِيهَآ ءَايَةًۭ لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ ﴿37﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

इसके पश्चात हमने वहाँ उन लोगों के लिए एक निशानी छोड़ दी, जो दुखद यातना से डरते है

وَفِى مُوسَىٰٓ إِذْ أَرْسَلْنَٰهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍۢ ﴿38﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और मूसा के वृतान्त में भी (निशानी है) जब हमने फ़िरऔन के पास के स्पष्ट प्रमाण के साथ भेजा,

فَتَوَلَّىٰ بِرُكْنِهِۦ وَقَالَ سَٰحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌۭ ﴿39﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

किन्तु उसने अपनी शक्ति के कारण मुँह फेर लिया और कहा, "जादूगर है या दीवाना।"

فَأَخَذْنَٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذْنَٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ وَهُوَ مُلِيمٌۭ ﴿40﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अन्ततः हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी में फेंक दिया, इस दशा में कि वह निन्दनीय था

وَفِى عَادٍ إِذْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلرِّيحَ ٱلْعَقِيمَ ﴿41﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और आद में भी (तुम्हारे लिए निशानी है) जबकि हमने उनपर अशुभ वायु चला दी

مَا تَذَرُ مِن شَىْءٍ أَتَتْ عَلَيْهِ إِلَّا جَعَلَتْهُ كَٱلرَّمِيمِ ﴿42﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

वह जिस चीज़ पर से गुज़री उसे उसने जीर्ण-शीर्ण करके रख दिया

وَفِى ثَمُودَ إِذْ قِيلَ لَهُمْ تَمَتَّعُوا۟ حَتَّىٰ حِينٍۢ ﴿43﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और समुद्र में भी (तुम्हारे लिए निशानी है) जबकि उनसे कहा गया, "एक समय तक मज़े कर लो!"

فَعَتَوْا۟ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّٰعِقَةُ وَهُمْ يَنظُرُونَ ﴿44﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

किन्तु उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर कड़क ने उन्हें आ लिया और वे देखते रहे

فَمَا ٱسْتَطَٰعُوا۟ مِن قِيَامٍۢ وَمَا كَانُوا۟ مُنتَصِرِينَ ﴿45﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर वे न खड़े ही हो सके और न अपना बचाव ही कर सके

وَقَوْمَ نُوحٍۢ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَٰسِقِينَ ﴿46﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और इससे पहले नूह की क़ौम को भी पकड़ा। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग थे

وَٱلسَّمَآءَ بَنَيْنَٰهَا بِأَيْي۟دٍۢ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ ﴿47﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

आकाश को हमने अपने हाथ के बल से बनाया और हम बड़ी समाई रखनेवाले है

وَٱلْأَرْضَ فَرَشْنَٰهَا فَنِعْمَ ٱلْمَٰهِدُونَ ﴿48﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और धरती को हमने बिछाया, तो हम क्या ही ख़ूब बिछानेवाले है

وَمِن كُلِّ شَىْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿49﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम ध्यान दो

فَفِرُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ ﴿50﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अतः अल्लाह की ओर दौड़ो। मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक प्रत्यक्ष सावधान करनेवाला हूँ

وَلَا تَجْعَلُوا۟ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ ﴿51﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न ठहराओ। मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक प्रत्यक्ष सावधान करनेवाला हूँ

كَذَٰلِكَ مَآ أَتَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا۟ سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ ﴿52﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

इसी तरह उन लोगों के पास भी, जो उनसे पहले गुज़र चुके है, जो भी रसूल आया तो उन्होंने बस यही कहा, "जादूगर है या दीवाना!"

أَتَوَاصَوْا۟ بِهِۦ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌۭ طَاغُونَ ﴿53﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

क्या उन्होंने एक-दूसरे को इसकी वसीयत कर रखी है? नहीं, बल्कि वे है ही सरकश लोग

فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَآ أَنتَ بِمَلُومٍۢ ﴿54﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अतः उनसे मुँह फेर लो अब तुमपर कोई मलामत नहीं

وَذَكِّرْ فَإِنَّ ٱلذِّكْرَىٰ تَنفَعُ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿55﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और याद दिलाते रहो, क्योंकि याद दिलाना ईमानवालों को लाभ पहुँचाता है

وَمَا خَلَقْتُ ٱلْجِنَّ وَٱلْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ﴿56﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

मैंने तो जिन्नों और मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी बन्दगी करे

مَآ أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍۢ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ ﴿57﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ

إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلْقُوَّةِ ٱلْمَتِينُ ﴿58﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

निश्चय ही अल्लाह ही है रोज़ी देनेवाला, शक्तिशाली, दृढ़

فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ذَنُوبًۭا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَٰبِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ ﴿59﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अतः जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है उनके लिए एक नियत पैमाना है; जैसा उनके साथियों का नियत पैमाना था। अतः वे मुझसे जल्दी न मचाएँ!

فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن يَوْمِهِمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ ﴿60﴾

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

अतः इनकार करनेवालों के लिए बड़ी खराबी है, उनके उस दिन के कारण जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही है

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