उत्तर- उसका शुक्र अदा करना वाजिब है, और वह इस तरह हो सकता है कि ज़ुबान से उसकी प्रशंसा करें, कि यह तमाम फ़ज़ीलतें (अनुग्रह) उसी की हैं। फिर इन नेमतों का प्रयोग उस कार्य में करें जिससे वह राज़ी हो, न कि गुनाह के रास्ते में।
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