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इंसान को सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?

Faith and belief
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इंसान को सुख अल्लाह के सामने झुकने, उसकी आज्ञा का पालन करने और उसके निर्णय और भाग्य से संतुष्ट होने से प्राप्त होता है।

बहुत-से लोग दावा करते हैं कि सब कुछ आंतरिक रूप से अर्थहीन है, इस लिए हम एक आनंदपूर्ण जीवन पाने के उद्देश्य से अपने लिए (जीवन) का स्वयं एक अर्थ (लक्ष्य) बना सकते हैं। हमारे अस्तित्व के उद्देश्य को नकारना वास्तव में अपने आप को धोखा देना है। जैसे हम अपने आप से कह रहे हों कि "आइए कल्पना करें या दिखावा करें कि हमारे जीवन का एक उद्देश्य है।" जैसे हम उन बच्चों की तरह हैं जो डॉक्टर और नर्स या माता और पिता बनकर खेलने का नाटक करते हैं। जब तक हम जीवन के उद्देश्य को जान नहीं लेते, तब तक हमें सुख नहीं मिल सकता।

यदि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध लग्जरी ट्रेन में बिठा दिया जाए। वह प्रथम श्रेणी में यात्र कर रहा हो, एक शानदार और आरामदायक अनुभव हो और विलासिता की पराकाष्ठा हो। क्या वह उसके दिमाग में घूम रहे इन सवालों के जवाब मिले बिना इस यात्रा से खुश हो सकेगा कि वह मैं ट्रेन में कैसे चढ़ा? इस यात्रा का उद्देश्य क्या है? ट्रेन कहाँ जा रही है? यदि ये प्रश्न अनुत्तरित रहें, तो वह कैसे प्रसन्न हो सकता है? भले ही वह अपने तहत सभी विलासिता का आनंद लेना शुरू कर दे, फिर भी वह कभी भी सच्चा और सार्थक आनंद प्राप्त नहीं करे सकेगा। क्या इस यात्रा में स्वादिष्ट भोजन उसके इन सवालों को भूलने के लिए पर्याप्त है? दरअसल इस तरह की खुशी अस्थायी और नकली होगी और इन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब खोजने के विषय को जानबूझकर अनदेखा करके ही ऐसी खुशी प्राप्त किया जा सकती है। यह नशे की वजह से पैदा होने वाली एक हालत की तरह है, जो नशा करने वाले को विनाश की ओर ले जाती है। इस प्रकार, मनुष्य को सच्चा सुख तब तक प्राप्त नहीं हो सकता, जब तक कि वह इन अस्तित्वगत प्रश्नों के उत्तर न खोज ले।

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