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क्या इस्लाम में इमाम, ईसाई धर्म में पादरी की तरह है?

Prophethood and seerah
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इमाम का अर्थ वह व्यक्ति है, जो लोगों को नमाज़ पढ़ाए, उनकी देख-भाल करे या उनका नेतृत्व करे। यह कुछ खास लोगों तक सीमित धार्मिक पद नहीं है। इस्लाम में कोई जातिवाद या पुरोहितवाद नहीं है। इस्लाम धर्म सभी के लिए है। लोग अल्लाह के सामने कंघे के दांतों की तरह समान हैं। एक अरब या एक गैर-अरब के बीच कोई अंतर नहीं है। अगर है भी तो धर्मपरायणता और अच्छे कामों की बुनियाद पर। नमाज़ पढ़ाने का सबसे ज़्यादा हक़दार वह व्यक्ति है, जिसे कुरआन ज्यादा और अच्छा याद हो और जो नमाज़ से संबंधित नियमों को सबसे अधिक जानने वाला है। मुसलमानों के निकट इमाम का जो भी महत्व हो, वह किसी भी स्थिति में स्वीकारोक्ति नहीं सुनता है और पापों को क्षमा नहीं करता है, जैसा कि पादरी की स्थिति है।

''उन्होंने अपने विद्वानों और धर्माचारियों (संतों) को अल्लाह के सिवा पूज्य बना लिया तथा मरयम के पुत्र मसीह को, जबकि उन्हें जो आदेश दिया गया था, वह इसके सिवा कुछ न था कि एक अल्लाह की इबादत (वंदना) करें। कोई पूज्य नहीं है, परन्तु वही। वह उससे पवित्र है, जिसे उसका साझी बना रहे हैं।'' [170] [सूरा अल-तौबा : 31]

इस्लाम इस बात की पुष्टि करता है कि नबी अल्लाह का जो संदेश पहुँचते हैं, उसमें उनसे कोई त्रुटि नहीं होती। जबकि कोई पुजारी या संत न तो ग़लती से पाक होता है और न उसके पास वह्य आती है। इस्लाम में गैर-अल्लाह से मदद माँगने के लिए उसकी शरण में जाना बिल्कुल हराम है। चाहे यह मदद नबियों ही से क्यों न माँगी जाए। जिसके हाथ में कुछ नहीं है, वह दूसरे को कुछ दे नहीं सकता है। इंसान अल्लाह के अलावा किसी दूसरे से कैसे मदद माँग सकता है, जबकि वह दूसरा अपने आपकी मदद नहीं कर सकता है। अल्लाह से माँगना सम्मान है, जबकि उसके अलावा किसी और से माँगना अपमान है। क्या राजा एवं प्रजा के बीच माँगने में बराबरी करना तार्किक है। तर्क और बुद्धि इस विचार का पूरी तरह से खंडन करती है। पूज्य के अस्तित्व एवं उसके हर चीज़ पर सामर्थ्य होने के ईमान के साथ गैर-अल्लाह से माँगना फ़िजूल है, शिर्क है, इस्लाम के विरूद्ध है और सबसे बड़ा पाप है।

अल्लाह तआला रसूल की ज़ुबानी कहता है :

''आप कह दें कि मैं तो अपने लाभ और हानि का मालिक नहीं हूँ, परन्तु जो अल्लाह चाहे, (वही होता है)। यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता, तो मैं बहुत-सा लाभ प्राप्त कर लेता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।'' [171] [सूरा अल-आराफ़ : 188]

''आप कह दे : मैं तो तुम्हारे जैसा ही एक मनुष्य हूँ, मेरी ओर प्रकाशना (वह़्य) की जाती है कि तुम्हारा पूज्य केवल एक ही पूज्य है। अतः जो कोई अपने पालनहार से मिलने की आशा रखता हो, उसके लिए आवश्यक है कि वह अच्छे कर्म करे और अपने पालनहार की इबादत में किसी को साझी न बनाए।'' [172] [सूरा अल-कह्फ़ : 110]

"और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं। अतः अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को कदाचित न पुकारो।” [173] [सूरा अल-जिन्न : 18]

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