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අසල්වැසියාගේ අයිතිය සම්බන්ධයෙන් ඉස්ලාමයේ ස්ථාවරය කුමක්ද?

Ethics, rights and dealings
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अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है।” पूछा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह बात आप किसके बारे में कह रहे हैं? आपने उत्तर दिया : “जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से सुरक्षित नहीं रहता।” [249] [सहीह बुख़ारी तथा सहीह मुस्लिम]

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है: ''पड़ोसी को शुफ़आ का अधिकार (अर्थात वह खरीदार पर ज़ोर डालकर पड़ोसी की संपत्ति ख़रीद सकता है) है। यदि पड़ोसी ग़ायब हो तो उसकी प्रतीक्षा की जाएगी, यदि उन दोनों का रास्ता एक हो।'' [250] [मुसनद इमाम अहमद]

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''ऐ अबूज़र! जब शोरबा पकाओ, तो उसमें पानी ज़्यादा डाल दो और पड़ोसियों का भी ख़्याल रख लो।'' [251] [इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।]

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''जिसके पास ज़मीन हो और वह उसे बेचना चाहता हो, तो (पहले) खरीदने का अवसर अपने पड़ोसी को दे।'' [252] [यह हदीस सहीह है और सुनन इब्न-ए-माजा में मौजूद है।]

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